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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश  »  श्लोक d1-35
 
 
श्लोक  12.104.d1-35 
(त्यक्तं स्वायम्भुवे वंशे शुभेन भरतेन च।
नानारत्नसमाकीर्णं राज्यं स्फीतमिति श्रुतम्॥
तथान्यैर्भूमिपालैश्च त्यक्तं राज्यं महोदयम्।
त्यक्त्वा राज्यानि सर्वे च वने वन्यफलाशना:॥
गताश्च तपस: पारं दु:खस्यान्तं च भूमिपा:।)
बहुसंकुसुकं दृष्ट्वा विधित्सासाधनेन च।
तथान्ये संत्यजन्त्येव मत्वा परमदुर्लभम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
मैंने सुना है कि स्वायंभुव मनु के वंश में उत्पन्न, उत्तम आचरण और विचारों वाले राजा भरत ने नाना प्रकार के रत्नों से युक्त अपने समृद्ध राज्य का परित्याग कर दिया। इसी प्रकार देश के अन्य राजाओं ने भी अपने महान समृद्ध राज्यों का परित्याग कर दिया। वे सभी राजा अपने राज्यों का परित्याग करके वन में जंगली फल-मूल खाकर रहने लगे। वहाँ उन्होंने तपस्या और दुःख से पार पा लिया। धन की प्राप्ति निरन्तर प्रयत्न करने से होती है, परन्तु फिर भी उसे अत्यंत चंचल और अत्यंत दुर्लभ जानकर अन्य लोग उसका परित्याग कर देते हैं॥ 35॥
 
I have heard that King Bharata, born in the lineage of Svayambhuva Manu, who had good conduct and thoughts, abandoned his prosperous kingdom full of various kinds of gems. Similarly, other kings of the land also abandoned their great prosperous kingdoms. All those kings, leaving their kingdoms, lived in the forest eating wild fruits and roots. There they transcended austerity and suffering. Wealth is attained by constant effort, but even then, seeing that it is very unstable and considering it extremely rare, other people abandon it.॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)