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mahabharat 12.104.45: राजा! या तो मनुष्य धन छोड़ देता है या धन उसे छोड़ देता है। एक दिन ऐसा अवश्य होता है। यह जानकर धन की चिंता कौन करेगा?॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 12.104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.104.45 
धनं वा पुरुषो राजन् पुरुषं वा पुनर्धनम्।
अवश्यं प्रजहात्येव तद् विद्वान् कोऽनुसंज्वरेत्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
राजा! या तो मनुष्य धन छोड़ देता है या धन उसे छोड़ देता है। एक दिन ऐसा अवश्य होता है। यह जानकर धन की चिंता कौन करेगा?॥ 45॥
 
King! Either a man leaves his wealth or wealth leaves him. One day this definitely happens. Knowing this, who will worry about wealth?॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)