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संचये च विनाशान्ते मरणान्ते च जीविते।
संयोगे च वियोगान्ते को नु विप्रणयेन्मन:॥ ४४॥
अनुवाद
जब संचय का अन्त केवल नाश ही है, जब जीवन का अन्त केवल मृत्यु ही है और जब संयोग का अन्त केवल वियोग ही है, तब कौन अपनी बुद्धि इनकी ओर लगाएगा ॥44॥
When the end of accumulation is only destruction, when the end of life is only death and when the end of union is only separation, then who will turn his mind towards these? ॥ 44॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥