श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.104.39 
रममाण: श्रिया कश्चिन्नान्यच्छ्रेयोऽभिमन्यते।
तथा तस्येहमानस्य समारम्भो विनश्यति॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
कुछ लोग धन-संपत्ति में इतने मग्न हो जाते हैं कि उन्हें उसके अतिरिक्त सुख का कोई अन्य साधन सूझता ही नहीं। इसलिए वे धन कमाने का प्रयत्न करते रहते हैं। किन्तु भाग्यवश उस व्यक्ति के सारे प्रयत्न अचानक ही नष्ट हो जाते हैं ॥39॥
 
Some people get so engrossed in wealth that they do not think of any other means of happiness than that. Therefore, they keep trying to earn money. But due to fate, all the efforts of that person suddenly get destroyed. ॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)