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mahabharat 12.104.32: राजन! अपने को मनुष्य समझने वाले बहुत से लोग ईर्ष्या और अहंकार से भरे हुए हैं। कोसलराज! क्या आप इतने ईर्ष्यालु नहीं हैं? 32॥   |   mahabharat अध्याय 12.104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.104.32 
ईर्ष्याभिमानसम्पन्ना राजन् पुरुषमानिन:।
कच्चित् त्वं न तथा राजन् मत्सरी कोसलाधिप॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
राजन! अपने को मनुष्य समझने वाले बहुत से लोग ईर्ष्या और अहंकार से भरे हुए हैं। कोसलराज! क्या आप इतने ईर्ष्यालु नहीं हैं? 32॥
 
Rajan! Many people who consider themselves men are full of jealousy and ego. King of Kosalan! Aren't you that jealous? 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)