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mahabharat 12.104.26: तपोधन! जैसे जल का प्रवाह किसी भी वस्तु को बहा ले जाता है, वैसे ही काल के बल से मेरा राज्य हरण हो गया। उसी के फलस्वरूप मैं यह दुःख भोग रहा हूँ और जो कुछ मिलता है, उसी से किसी प्रकार अपना जीवन निर्वाह कर रहा हूँ॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 12.104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.104.26 
तस्यैव ह्रियमाणस्य स्रोतसेव तपोधन।
फलमेतत् प्रपश्यामि यथालब्धेन वर्तयन्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
तपोधन! जैसे जल का प्रवाह किसी भी वस्तु को बहा ले जाता है, वैसे ही काल के बल से मेरा राज्य हरण हो गया। उसी के फलस्वरूप मैं यह दुःख भोग रहा हूँ और जो कुछ मिलता है, उसी से किसी प्रकार अपना जीवन निर्वाह कर रहा हूँ॥ 26॥
 
Tapodhan! Just as the current of water carries away any object, similarly my kingdom was abducted by the force of time. As a result of that I am experiencing this sorrow, and somehow I sustain my life with whatever I get.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)