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mahabharat 12.104.12: ऋषि बोले, "राजकुमार! आप बुद्धिमान हैं, अतः उचित था कि आपने अपनी बुद्धि से पहले ही यह निर्णय कर लिया होता। इस संसार में जो कुछ भी 'मैं' और 'मेरा' कहकर समझा या माना जाता है, वह सब अनित्य है।"   |   mahabharat अध्याय 12.104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.104.12 
मुनिरुवाच
पुरस्तादेव ते बुद्धिरियं कार्या विजानता।
अनित्यं सर्वमेवैतदहं च मम चास्ति यत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
ऋषि बोले, "राजकुमार! आप बुद्धिमान हैं, अतः उचित था कि आपने अपनी बुद्धि से पहले ही यह निर्णय कर लिया होता। इस संसार में जो कुछ भी 'मैं' और 'मेरा' कहकर समझा या माना जाता है, वह सब अनित्य है।"
 
The sage said, "Prince! You are intelligent; hence it was appropriate for you to have decided this earlier through your intelligence. Whatever is understood or accepted in this world by saying 'I' and 'mine', all that is temporary.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)