Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.103.8: जो राजा अपने शत्रु को मारना चाहता है, उसे अपने अन्दर क्रोध, भय और हर्ष को रोकना चाहिए और शत्रु को सचेत नहीं करना चाहिए ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 12.103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.103.8 
न शत्रुर्विवृत: कार्यो वधमस्याभिकाङ्क्षता।
क्रोधं भयं च हर्षं च नियम्य स्वयमात्मनि॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जो राजा अपने शत्रु को मारना चाहता है, उसे अपने अन्दर क्रोध, भय और हर्ष को रोकना चाहिए और शत्रु को सचेत नहीं करना चाहिए ॥8॥
 
A king who wishes to kill his enemy should restrain anger, fear and joy within himself and should not alert the enemy. 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)