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mahabharat 12.103.53: भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर! शत्रुओं का नाश करने वाले, शत्रुओं को मारने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले इन्द्र ने बृहस्पति के सत्य वचन सुनकर वैसा ही किया। उन्होंने उचित समय पर विजय के लिए यात्रा की और अपने समस्त शत्रुओं को अपने वश में कर लिया।॥53॥   |   mahabharat अध्याय 12.103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  12.103.53 
भीष्म उवाच
स तद्वच: शत्रुनिबर्हणे रत-
स्तथा चकारावितथं बृहस्पते:।
चचार काले विजयाय चारिहा
वशं च शत्रूननयत् पुरंदर:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर! शत्रुओं का नाश करने वाले, शत्रुओं को मारने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले इन्द्र ने बृहस्पति के सत्य वचन सुनकर वैसा ही किया। उन्होंने उचित समय पर विजय के लिए यात्रा की और अपने समस्त शत्रुओं को अपने वश में कर लिया।॥53॥
 
Bhishma says - Yudhishthira! Indra, the destroyer of enemies, who is always ready to kill his enemies, heard Brihaspati's true words and did the same. He set out on a journey for victory at the opportune moment and brought all his enemies under his control. ॥ 53॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि इन्द्रबृहस्पतिसंवादे त्र्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १०३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवादविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)