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mahabharat 12.103.5: जब दो सेनाएँ आपस में भिड़ती हैं, तब दोनों पक्षों की विजय एक समान हो जाती है (अब ऐसा नियम नहीं रहा कि कोई एक ही पक्ष जीतेगा)। अतः मैं ऐसा क्या करूँ कि शत्रुओं को कष्ट देने वाला यह तेजस्वी राज्य का धन मुझसे कभी न छूटे ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.103.5 
सेनयोर्व्यतिषङ्गेण जय: साधारणो भवेत्।
किंकुर्वाणं न मां जह्याज्ज्वलिता श्री:प्रतापिनी॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जब दो सेनाएँ आपस में भिड़ती हैं, तब दोनों पक्षों की विजय एक समान हो जाती है (अब ऐसा नियम नहीं रहा कि कोई एक ही पक्ष जीतेगा)। अतः मैं ऐसा क्या करूँ कि शत्रुओं को कष्ट देने वाला यह तेजस्वी राज्य का धन मुझसे कभी न छूटे ॥5॥
 
When two armies clash, victory becomes a common thing for both sides (there is no longer a rule that only a particular side will win). So, what should I do so that this radiant kingdom's wealth, which causes torment to the enemies, never leaves me. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)