Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.103.48: जो बार-बार आकर सम्पर्क स्थापित करता है, किसी के चले जाने पर दोष बताता है, किसी कार्य को करने का वचन देता है परन्तु उसके दूर होने पर उसे नहीं करता, तथा किसी के सामने होने पर भी उससे बात नहीं करता, उसका मन भी बुराई से भरा हुआ जानना चाहिए ॥48॥ | mahabharat अध्याय 12.103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
करोत्यभीक्ष्णं संसृष्टमसंसृष्टश्च भाषते।
अदृष्टितो न कुरुते दृष्टो नैवाभिभाषते॥ ४८॥
अनुवाद
जो बार-बार आकर सम्पर्क स्थापित करता है, किसी के चले जाने पर दोष बताता है, किसी कार्य को करने का वचन देता है परन्तु उसके दूर होने पर उसे नहीं करता, तथा किसी के सामने होने पर भी उससे बात नहीं करता, उसका मन भी बुराई से भरा हुआ जानना चाहिए ॥48॥
He who repeatedly comes and establishes contact, points out the faults when someone goes away, promises to do a task but does not do it when he is out of sight, and does not talk to someone even when he is in front of them, his mind should also be known to be filled with evil. ॥ 48॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥