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mahabharat 12.103.42: हे बल और वृत्रासुर का वध करनेवाले इन्द्र! पृथ्वी पर शासन करनेवाले राजाओं को चाहिए कि वे पहले इन शत्रुओं के नगरों में अपनाई जानेवाली नीति का प्रदर्शन करें। उनके नगरों में अनुकूल आचरण करके वे अपनी राजधानी के समस्त सुखों पर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं ॥ 42॥   |   mahabharat अध्याय 12.103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  12.103.42 
पुरापि चैषामनुसृत्य भूमिपा:
पुरेषु भोगानखिलान् जयन्ति।
पुरेषु नीतिं विहितां यथाविधि
प्रयोजयन्तो बलवृत्रसूदन॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
हे बल और वृत्रासुर का वध करनेवाले इन्द्र! पृथ्वी पर शासन करनेवाले राजाओं को चाहिए कि वे पहले इन शत्रुओं के नगरों में अपनाई जानेवाली नीति का प्रदर्शन करें। उनके नगरों में अनुकूल आचरण करके वे अपनी राजधानी के समस्त सुखों पर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं ॥ 42॥
 
O Indra, the slayer of Bala and Vritrasura! The kings who rule the earth should first demonstrate the policy followed in the cities of these enemies. By behaving in a favorable manner in their cities, they gain control over all the pleasures in their capital. ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)