Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.103.4: इन्द्र ने कहा - ब्रह्मन्! मैं अपने शत्रुओं के साथ आलस्य न करते हुए कैसा व्यवहार करूँ? उनका पूर्ण विनाश किए बिना उन्हें किस उपाय से वश में करूँ?॥4॥ | mahabharat अध्याय 12.103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इन्द्र उवाच
अहितेषु कथं ब्रह्मन् प्रवर्तेयमतन्द्रित:।
असमुच्छिद्य चैवैतान् नियच्छेयमुपायत:॥ ४॥
अनुवाद
इन्द्र ने कहा - ब्रह्मन्! मैं अपने शत्रुओं के साथ आलस्य न करते हुए कैसा व्यवहार करूँ? उनका पूर्ण विनाश किए बिना उन्हें किस उपाय से वश में करूँ?॥4॥
Indra said - Brahman! How should I behave towards my enemies without being lazy? By what means should I subdue them without destroying them completely?॥ 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥