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mahabharat 12.103.33: कहा गया है कि भिन्न-भिन्न व्यवहारकुशल लोगों के धन पर शासन करना तभी संभव है जब राजा एकाग्रता का आश्रय लेकर सदैव उसके लिए प्रयत्नशील रहे और यह विचार करता रहे कि कौन मित्र है और कौन शत्रु ॥33॥   |   mahabharat अध्याय 12.103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.103.33 
तथा विविधवृत्तानामपि सम्भव उच्यते।
यतते योगमास्थाय मित्रामित्रं विचारयेत्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
कहा गया है कि भिन्न-भिन्न व्यवहारकुशल लोगों के धन पर शासन करना तभी संभव है जब राजा एकाग्रता का आश्रय लेकर सदैव उसके लिए प्रयत्नशील रहे और यह विचार करता रहे कि कौन मित्र है और कौन शत्रु ॥33॥
 
It has been said that it is possible to rule over the wealth of people having different practical skills only when the king takes recourse to concentration and always strives for it and keeps thinking about who is a friend and who is an enemy. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)