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mahabharat 12.103.23: काम, क्रोध और अहंकार को त्यागकर शत्रुओं की दुर्बलताओं को बार-बार ध्यानपूर्वक देखना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 12.103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.103.23 
विहाय कामं क्रोधं च तथाहंकारमेव च।
युक्तो विवरमन्विच्छेदहितानां पुन: पुन:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
काम, क्रोध और अहंकार को त्यागकर शत्रुओं की दुर्बलताओं को बार-बार ध्यानपूर्वक देखना चाहिए।
 
Giving up lust, anger and ego, one should carefully look again and again at the weaknesses of the enemies. 23.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)