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नैतत् प्रशंसन्त्याचार्या न च साधुनिदर्शनम्।
अक्रोधेनाविनाशेन नियन्तव्या: स्वपुत्रवत् ॥ ३२॥
अनुवाद
परन्तु आचार्य इसकी प्रशंसा नहीं करते; क्योंकि यह ऋषियों का उदाहरण नहीं है। राजा को चाहिए कि पुत्र के समान क्रोध किए बिना ही अपने शत्रुओं को वश में कर ले; उसका नाश न करे॥32॥
But the Acharyas do not praise this; Because this is not an example of sages. A king should, like a son, subdue his enemies without getting angry; Do not destroy it. 32॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥