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mahabharat 12.102.32: परन्तु आचार्य इसकी प्रशंसा नहीं करते; क्योंकि यह ऋषियों का उदाहरण नहीं है। राजा को चाहिए कि पुत्र के समान क्रोध किए बिना ही अपने शत्रुओं को वश में कर ले; उसका नाश न करे॥32॥   |   mahabharat अध्याय 12.102: विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान् सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.102.32 
नैतत् प्रशंसन्त्याचार्या न च साधुनिदर्शनम्।
अक्रोधेनाविनाशेन नियन्तव्या: स्वपुत्रवत् ॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
परन्तु आचार्य इसकी प्रशंसा नहीं करते; क्योंकि यह ऋषियों का उदाहरण नहीं है। राजा को चाहिए कि पुत्र के समान क्रोध किए बिना ही अपने शत्रुओं को वश में कर ले; उसका नाश न करे॥32॥
 
But the Acharyas do not praise this; Because this is not an example of sages. A king should, like a son, subdue his enemies without getting angry; Do not destroy it. 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)