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mahabharat 12.102.31: शम्बरासुर का मत है कि पहले शत्रु को पीड़ा देकर दुर्बल करना और फिर उसे क्षमा करना अच्छा है; क्योंकि यदि टेढ़ी लकड़ी को बिना गरम किए सीधा कर दिया जाए तो वह पहले जैसी हो जाती है ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 12.102: विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान् सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 102: विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान् सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.102.31 
मन्यते कर्षयित्वा तु क्षमा साध्वीति शम्बर:।
असंतप्तं तु यद् दारु प्रत्येति प्रकृतिं पुन:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
शम्बरासुर का मत है कि पहले शत्रु को पीड़ा देकर दुर्बल करना और फिर उसे क्षमा करना अच्छा है; क्योंकि यदि टेढ़ी लकड़ी को बिना गरम किए सीधा कर दिया जाए तो वह पहले जैसी हो जाती है ॥31॥
 
Shambarasur's opinion is that it is better to first weaken the enemy by inflicting pain and then show forgiveness to him; because if a crooked piece of wood is straightened without heating it, it becomes as it was before. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)