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mahabharat 12.102.22: जब तक किसी प्रकार संधि न हो सके, युद्ध स्वीकार नहीं करना चाहिए। पहले कूटनीतिक युक्तियों से उन्हें समझाओ। यदि इससे भी काम न चले, तो फूट डालो। यदि इससे भी सफलता न मिले, तो दान की नीति अपनाओ - शत्रु के सहायकों को धन देकर वश में करने का प्रयत्न करो। यदि ये तीनों विधियाँ सफल न हों, तो अन्त में युद्ध का ही आश्रय लेना उचित कहा गया है॥22॥   |   mahabharat अध्याय 12.102: विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान् सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.102.22 
संनिपातो न मन्तव्य: शक्ये सति कथंचन।
सान्त्वभेदप्रदानानां युद्धमुत्तरमुच्यते॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जब तक किसी प्रकार संधि न हो सके, युद्ध स्वीकार नहीं करना चाहिए। पहले कूटनीतिक युक्तियों से उन्हें समझाओ। यदि इससे भी काम न चले, तो फूट डालो। यदि इससे भी सफलता न मिले, तो दान की नीति अपनाओ - शत्रु के सहायकों को धन देकर वश में करने का प्रयत्न करो। यदि ये तीनों विधियाँ सफल न हों, तो अन्त में युद्ध का ही आश्रय लेना उचित कहा गया है॥22॥
 
Unless a treaty can be reached in any way, war should not be accepted. First, make them understand through diplomatic tactics. If this does not work, then divide the enemies through the tactics of division. If this also does not succeed, then use the policy of charity - try to subdue the enemy's helpers by giving them money. If these three methods do not succeed, then it is said to be appropriate to resort to war in the end.॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)