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mahabharat 12.100.3-4: युधिष्ठिर! अब मैं उन धर्मों का वर्णन करूँगा जो अर्थ की प्राप्ति के साधन हैं। यदि डाकू और चोर अर्थ और धर्म की मर्यादा तोड़ने लगें, तो मैं उनके विनाश के लिए वेदों में बताए गए उपायों का वर्णन करूँगा। सभी कार्यों में सफलता पाने के लिए उन उपायों के विषय में मुझसे सुनो। ॥3-4॥   |   mahabharat अध्याय 12.100: सैन्यसंचालनकी रीति-नीतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 100: सैन्यसंचालनकी रीति-नीतिका वर्णन  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  12.100.3-4 
उपायधर्मान् वक्ष्यामि सिद्धार्थानर्थधर्मयो:।
निर्मर्यादा दस्यवस्तु भवन्ति परिपन्थिन:॥ ३॥
तेषां प्रतिविघातार्थं प्रवक्ष्याम्यथ नैगमम्।
कार्याणां सर्वसिद्धॺर्थं तानुपायान् निबोध मे॥ ४॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! अब मैं उन धर्मों का वर्णन करूँगा जो अर्थ की प्राप्ति के साधन हैं। यदि डाकू और चोर अर्थ और धर्म की मर्यादा तोड़ने लगें, तो मैं उनके विनाश के लिए वेदों में बताए गए उपायों का वर्णन करूँगा। सभी कार्यों में सफलता पाने के लिए उन उपायों के विषय में मुझसे सुनो। ॥3-4॥
 
Yudhishthira! Now I will describe the Dharmas which are the means of achieving Arthas. If robbers and thieves start breaking the limits of Artha and Dharma, then I will start describing the means mentioned in the Vedas for their destruction. Listen to me about those methods for achieving success in all tasks. ॥ 3-4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)