श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 10: भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.10.3 
क्षमानुकम्पा कारुण्यमानृशंस्यं न विद्यते।
क्षात्रमाचरतो मार्गमपि बन्धोस्त्वदन्तरे॥ ३॥
 
 
अनुवाद
क्षत्रिय मार्ग पर चलने वाला मनुष्य अपने भाई के प्रति भी क्षमा, दया, करुणा या कोमलता का भाव नहीं रखता; फिर तेरे हृदय में यह सब क्यों है?॥3॥
 
A man following the path of a Kshatriya does not have any feeling of forgiveness, mercy, compassion or tenderness even towards his brother; then why do you have all this in your heart?॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)