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mahabharat 12.10.22: जो पुरुष अपने पुत्र-पौत्रों का पालन करने में असमर्थ है, जो देवताओं, ऋषियों और पितरों को संतुष्ट नहीं कर सकता तथा जिसमें अतिथियों को भोजन कराने की भी शक्ति नहीं है, ऐसा पुरुष ही वन में अकेला रहकर सुखपूर्वक रह सकता है (यह आप जैसे शक्तिशाली पुरुषों का काम नहीं है)।॥ 22॥   |   mahabharat अध्याय 12.10: भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 10: भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.10.22 
शक्यं पुनररण्येषु सुखमेकेन जीवितुम्।
अबिभ्रता पुत्रपौत्रान् देवर्षीनतिथीन् पितॄन्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुष अपने पुत्र-पौत्रों का पालन करने में असमर्थ है, जो देवताओं, ऋषियों और पितरों को संतुष्ट नहीं कर सकता तथा जिसमें अतिथियों को भोजन कराने की भी शक्ति नहीं है, ऐसा पुरुष ही वन में अकेला रहकर सुखपूर्वक रह सकता है (यह आप जैसे शक्तिशाली पुरुषों का काम नहीं है)।॥ 22॥
 
A man who is incapable of looking after his sons and grandsons, who cannot satisfy the gods, sages and forefathers, and who does not even have the power to feed guests, only such a man can live alone in the forests and live happily (this is not the job of powerful men like you).॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)