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आपत्काले हि संन्यास: कर्तव्य इति शिष्यते।
जरयाभिपरीतेन शत्रुभिर्व्यंसितेन वा॥ १७॥
अनुवाद
शास्त्रों में कहा गया है कि विपत्ति के समय, वृद्धावस्था के कारण दुर्बल हो जाने पर, शत्रुओं द्वारा धन से वंचित हो जाने पर संन्यास धारण कर लेना चाहिए।॥17॥
The scriptures teach that in times of adversity or when one is frail due to old age or when one is deprived of wealth by enemies, one should adopt sannyasa.॥ 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥