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mahabharat 12.10.11: जिस प्रकार मनुष्य मन में कोई आशा लेकर लंबी दूरी की यात्रा करता है और वहाँ पहुँचकर निराश होकर लौटता है, उसी प्रकार हमारा कार्य भी व्यर्थ सिद्ध हो रहा है ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 12.10: भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 10: भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.10.11 
यथा महान्तमध्वानमाशया पुरुष: पतन्।
स निराशो निवर्तेत कर्मैतन्नस्तथोपमम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार मनुष्य मन में कोई आशा लेकर लंबी दूरी की यात्रा करता है और वहाँ पहुँचकर निराश होकर लौटता है, उसी प्रकार हमारा कार्य भी व्यर्थ सिद्ध हो रहा है ॥11॥
 
Just as a person travels a long distance with some hope in his mind and on reaching there returns disappointed, our work is also proving futile in the same way. ॥11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)