श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 7: संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  11.7.20 
अनुतर्षुलमेवैतद् दु:खं भवति मारिष।
राज्यनाशं सुहृन्नाशं सुतनाशं च भारत॥ २०॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! जिसकी तृष्णा बढ़ जाती है, वह राज्य, मित्र और पुत्रों का नाश रूप यह महान दुःख प्राप्त करता है॥20॥
 
Honorable India! He whose thirst is increased, he gets this great sorrow in the form of loss of kingdom, friends and sons. 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)