श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 7: संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  11.7.16-17 
संसारे भ्रमतां राजन् दु:खमेतद्धि जायते॥ १६॥
तस्मादस्य निवृत्त्यर्थं यत्नमेवाचरेद् बुध:।
उपेक्षा नात्र कर्तव्या शतशाख: प्रवर्धते॥ १७॥
 
 
अनुवाद
राजन! संसार में भटकने वाले मनुष्य इस दुःख को अवश्य प्राप्त करते हैं; अतः बुद्धिमान पुरुष को इस संसार-बन्धन से छूटने के लिए प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। इस विषय की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए; अन्यथा यह संसार सैकड़ों शाखाओं में फैलकर बहुत बड़ा हो जाता है। 16-17॥
 
Rajan! Those who wander in the world definitely get this sorrow; Therefore, a wise man must make efforts to get rid of this worldly bondage. This matter should never be neglected; Otherwise this world becomes very big by spreading into hundreds of branches. 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)