श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 7: संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  11.7.15-16h 
यस्तान् संयमते बुद्धॺा संयतो न निवर्तते।
ये तु संसारचक्रेऽस्मिंश्चक्रवत् परिवर्तिते॥ १५॥
भ्रममाणा न मुह्यन्ति संसारे न भ्रमन्ति ते।
 
 
अनुवाद
परन्तु जो लोग अपनी बुद्धि के द्वारा इन्द्रिय-अश्वों को वश में कर लेते हैं, वे इस संसार में लौटकर नहीं आते। जो लोग इस संसार-चक्र में घूमते हुए भी मोह के प्रभाव में नहीं आते, उन्हें फिर इस संसार में भटकना नहीं पड़ता। ॥15 1/2॥
 
But those who control the sense-horses with the help of their intellect do not return to this world. Those who do not succumb to the influence of delusion even while revolving in this world-wheel, do not have to wander in this world again. ॥15 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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