श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 7: संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  11.7.1 
धृतराष्ट्र उवाच
अहोऽभिहितमाख्यानं भवता तत्त्वदर्शिना।
भूय एव तु मे हर्ष: श्रुत्वा वागमृतं तव॥ १॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले- विदुर! आपने बड़ी सुन्दर कथा कही है। आप सचमुच सत्य के ज्ञाता हैं। आपकी अमृतमयी वाणी को पुनः सुनकर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी॥1॥
 
Dhritarashtra said- Vidur! You have narrated a wonderful story. You are truly a knower of truth. I will be very happy to hear your nectar-like voice again.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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