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mahabharat 11.6.6-7h: ऊपर वर्णित सर्प नाना प्रकार के रोग हैं। विद्वान लोग वन की सीमा पर खड़ी हुई विशालकाय स्त्री को पुरुषरूपी तथा तेज को नष्ट करने वाली वृद्धावस्था बताते हैं।   |   mahabharat अध्याय 11.6: संसाररूपी वनके रूपकका स्पष्टीकरण   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 6: संसाररूपी वनके रूपकका स्पष्टीकरण  »  श्लोक 6-7h
 
 
श्लोक  11.6.6-7h 
ये च ते कथिता व्याला व्याधयस्ते प्रकीर्तिता:।
या सा नारी बृहत्काया अध्यतिष्ठत तत्र वै॥ ६॥
तामाहुस्तु जरां प्राज्ञा रूपवर्णविनाशिनीम्।
 
 
अनुवाद
ऊपर वर्णित सर्प नाना प्रकार के रोग हैं। विद्वान लोग वन की सीमा पर खड़ी हुई विशालकाय स्त्री को पुरुषरूपी तथा तेज को नष्ट करने वाली वृद्धावस्था बताते हैं।
 
The snakes mentioned above are various kinds of diseases. The learned describe the gigantic woman standing at the boundary of the forest as a male figure and old age which destroys radiance. 6 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)