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श्लोक 11.5.24  |
एवं स वसते तत्र क्षिप्त: संसारसागरे।
न चैव जीविताशायां निर्वेदमुपगच्छति॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार संसार सागर में गिरा हुआ मनुष्य अनेक भयों से घिरा हुआ वहाँ रहता है; फिर भी उसमें जीवन की आशा जीवित रहती है और उसके मन में वैराग्य उत्पन्न नहीं होता ॥24॥ |
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| In this manner the man who has fallen into the ocean of the world lives there surrounded by so many fears; yet the hope of life remains alive in him and detachment does not arise in his mind. ॥24॥ |
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इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे पञ्चमोऽध्याय:॥ ५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५॥
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