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श्लोक 11.5.1  |
धृतराष्ट्र उवाच
यदिदं धर्मगहनं बुद्धॺा समनुगम्यते।
तद्धि विस्तरत: सर्वं बुद्धिमार्गं प्रशंस मे॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| धृतराष्ट्र बोले, "विदुर! धर्म का यह गहन स्वरूप केवल बुद्धि द्वारा ही जाना जा सकता है; अतः आप कृपा करके बुद्धि के सम्पूर्ण मार्ग का विस्तारपूर्वक मुझसे वर्णन करें।" |
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| Dhritarashtra said, "Vidur! This profound form of religion can only be known by the intellect; therefore, please describe to me in detail the complete path of intellect." |
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