श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 4: दु:खमय संसारके गहन स्वरूपका वर्णन और उससे छूटनेका उपाय  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  11.4.2-3 
विदुर उवाच
जन्मप्रभृति भूतानां क्रिया सर्वोपलक्ष्यते।
पूर्वमेवेह कलिले वसते किंचिदन्तरम्॥ २॥
तत: स पञ्चमेऽतीते मासे वासमकल्पयत्।
तत: सर्वाङ्गसम्पूर्णो गर्भो वै स तु जायते॥ ३॥
 
 
अनुवाद
विदुर जी बोले - महाराज! जब गर्भ में वीर्य और रजोधर्म का संयोग होता है, तब शरीर की वृद्धि की सम्पूर्ण प्रक्रिया शास्त्रविधि के अनुसार देखी जाती है।* प्रारम्भ में जीव कलिल (वीर्य और रजोधर्म के संयोग) रूप में रहता है, फिर कुछ दिनों के बाद जब पाँचवाँ महीना बीत जाता है, तब वह चेतना रूप में प्रकट होकर शरीर में रहने लगता है। इसके बाद गर्भस्थ शरीर अपने सभी अंगों से पूर्ण हो जाता है।॥2-3॥
 
Vidur ji said - Maharaj! When the semen and the menstrual blood unite in the womb, then the entire process of growth of the body is observed according to the scriptures.* In the beginning, the living being remains in the form of Kalil (combination of semen and menstrual blood), then after a few days, when the fifth month passes, it appears in the form of consciousness and starts living in the body. After this, the body in the womb becomes complete in all its parts.॥ 2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)