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mahabharat 11.4.14: वह दूसरों को मूर्ख कहता है, परन्तु अपनी ओर कभी नहीं देखता। वह दूसरों के दोषों के लिए उन्हें दोषी ठहराता है, परन्तु उन दोषों से बचने के लिए अपने मन को वश में नहीं करना चाहता।॥14॥   |   mahabharat अध्याय 11.4: दु:खमय संसारके गहन स्वरूपका वर्णन और उससे छूटनेका उपाय   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 4: दु:खमय संसारके गहन स्वरूपका वर्णन और उससे छूटनेका उपाय  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  11.4.14 
मूर्खानिति परानाह नात्मानं समवेक्षते।
दोषान् क्षिपति चान्येषां नात्मानं शास्तुमिच्छति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
वह दूसरों को मूर्ख कहता है, परन्तु अपनी ओर कभी नहीं देखता। वह दूसरों के दोषों के लिए उन्हें दोषी ठहराता है, परन्तु उन दोषों से बचने के लिए अपने मन को वश में नहीं करना चाहता।॥14॥
 
He calls others fools but never looks at himself. He blames others for their faults but does not want to control his mind to save himself from those faults.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)