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mahabharat 11.3.18-19: राजन! हे मनुष्यों के स्वामी! जैसे मनोरंजन के लिए जल में तैरता हुआ प्राणी कभी डूबता है और कभी ऊपर आता है, वैसे ही इस अथाह संसार सागर में भी प्राणी डूबते-उठते (मरते-जन्मते) रहते हैं। यहाँ केवल मंद बुद्धि वाले मनुष्य ही अपने कर्मों के फल से बँधकर दुःख भोगते हैं।   |   mahabharat अध्याय 11.3: विदुरजीका शरीरकी अनित्यता बताते हुए धृतराष्ट्रको शोक त्यागनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 3: विदुरजीका शरीरकी अनित्यता बताते हुए धृतराष्ट्रको शोक त्यागनेके लिये कहना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  11.3.18-19 
यथा तु सलिलं राजन् क्रीडार्थमनुसंतरत्।
उन्मज्जेच्च निमज्जेच्च किंचित् सत्त्वं नराधिप॥ १८॥
एवं संसारगहने उन्मज्जननिमज्जने।
कर्मभोगेन बध्यन्ते क्लिश्यन्ते चाल्पबुद्धय:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
राजन! हे मनुष्यों के स्वामी! जैसे मनोरंजन के लिए जल में तैरता हुआ प्राणी कभी डूबता है और कभी ऊपर आता है, वैसे ही इस अथाह संसार सागर में भी प्राणी डूबते-उठते (मरते-जन्मते) रहते हैं। यहाँ केवल मंद बुद्धि वाले मनुष्य ही अपने कर्मों के फल से बँधकर दुःख भोगते हैं।
 
King! O lord of men! Just as a creature swimming in water for fun sometimes drowns and sometimes comes up, similarly in this unfathomable ocean of the world, creatures keep sinking and rising (dying and taking birth). Only men of dull intellect get bound here by the consequences of their actions and suffer.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)