वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:।
आदिदेश सुधर्माणं धौम्यं सूतं च संजयम्॥ २४॥
विदुरं च महाबुद्धिं युयुत्सुं चैव कौरवम्।
इन्द्रसेनमुखांश्चैव भृत्यान् सूतांश्च सर्वश:॥ २५॥
भवन्त: कारयन्त्वेषां प्रेतकार्याण्यशेषत:।
यथा चानाथवत् किंचिच्छरीरं न विनश्यति॥ २६॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- महाराज! राजा धृतराष्ट्र की यह बात सुनकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने सुधर्मा, धौम्य, सारथि संजय, परम बुद्धिमान विदुर, कुरुवंशी युयुत्सु तथा इन्द्रसेन आदि सेवकों तथा समस्त सुत्रों को आदेश दिया कि इन सबका भूत-कर्म पूर्ण करो। ऐसा न हो कि कोई मृत शरीर अनाथ की भाँति नष्ट हो जाए।
Vaishampayanji says- Maharaj! On hearing this from King Dhritarashtra, Kunti's son Yudhishthir ordered Sudharma, Dhaumya, charioteer Sanjay, the most intelligent Vidur, Kuru dynasty Yuyutsu and Indrasen etc. servants and all the sutras to complete the ghostly acts of all of them. It should not happen that any dead body gets destroyed like an orphan.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥