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mahabharat 11.23.4: अरे! शर्म आनी चाहिए! देखो! ज़ख्म रहित चेहरा, जो सर्जरी के बाद पूर्णिमा जैसा लग रहा था और जिसकी आँखें कमल की पंखुड़ियों जैसी थीं, उसे कौवों ने आधा काट लिया है।   |   mahabharat अध्याय 11.23: शल्य, भगदत्त, भीष्म और द्रोणको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख गान्धारीका विलाप   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 23: शल्य, भगदत्त, भीष्म और द्रोणको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख गान्धारीका विलाप  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  11.23.4 
अहो धिक्पश्य शल्यस्य पूर्णचन्द्रसुदर्शनम्।
मुखं पद्मपलाशाक्षं काकैरादष्टमव्रणम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अरे! शर्म आनी चाहिए! देखो! ज़ख्म रहित चेहरा, जो सर्जरी के बाद पूर्णिमा जैसा लग रहा था और जिसकी आँखें कमल की पंखुड़ियों जैसी थीं, उसे कौवों ने आधा काट लिया है।
 
Oh! Shame on you. Look! The wound-free face, which looked like the full moon of a surgery and had eyes like lotus petals, has been partially bitten by crows.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)