श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 2: विदुरजीका राजा धृतराष्ट्रको समझाकर उनको शोकका त्याग करनेके लिये कहना  »  श्लोक 29-30h
 
 
श्लोक  11.2.29-30h 
नार्थो न धर्मो न सुखं यदेतदनुशोचसि॥ २९॥
न च नापैति कार्यार्थात्त्रिवर्गाच्चैव हीयते।
 
 
अनुवाद
तुम जो दुःख व्यक्त कर रहे हो, वह न तो धन के लिए, न धर्म के लिए, न सुख के लिए लाभदायक है। इससे मनुष्य न केवल अपने कर्तव्य पथ से भटक जाता है, अपितु धर्म, अर्थ और काम इन तीनों गुणों से भी वंचित हो जाता है॥29 1/2॥
 
The grief you are expressing is neither beneficial for wealth, nor for religion, nor for happiness. Through this, man not only strays from his path of duty, but also gets deprived of the three virtues of Dharma, Artha and Kama.॥ 29 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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