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श्री महाभारत
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पर्व 11: स्त्री पर्व
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अध्याय 2: विदुरजीका राजा धृतराष्ट्रको समझाकर उनको शोकका त्याग करनेके लिये कहना
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श्लोक 23
श्लोक
11.2.23
न कालस्य प्रिय: कश्चिन्न द्वेष्य: कुरुसत्तम।
न मध्यस्थ: क्वचित्काल: सर्वं काल: प्रकर्षति॥ २३॥
अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ! काल न किसी से प्रेम करता है, न किसी से द्वेष करता है, वह किसी के प्रति उदासीन भी नहीं है। काल सबको अपनी ओर खींचता है॥ 23॥
O best of the Kurus! Kaal neither loves nor hates anyone, he is not even indifferent to anyone. Kaal pulls everyone towards himself.॥ 23॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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