श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 18: अपने अन्य पुत्रों तथा दु:शासनको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  11.18.21-22 
उक्ता ह्यनेन पाञ्चाली सभायां द्यूतनिर्जिता।
प्रियं चिकीर्षता भ्रातु: कर्णस्य च जनार्दन॥ २१॥
सहैव सहदेवेन नकुलेनार्जुनेन च।
दासीभूतासि पाञ्चालि क्षिप्रं प्रविश नो गृहान्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जनार्दन! अपने भाई और कर्ण को प्रसन्न करने की इच्छा से उन्होंने भरी सभा में जुए में जीती हुई द्रौपदी से कहा था, 'पांचाली! तुम नकुल-सहदेव और अर्जुन के साथ हमारी दासी हो गयी हो; अतः शीघ्र ही हमारे घर में प्रवेश करो।'
 
Janardan! With the desire to please his brother and Karna, he had said to Draupadi, who was won through gambling, in the assembly, 'Panchali! You have become our maid along with Nakula-Sahadeva and Arjuna; therefore, enter our houses soon.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)