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mahabharat 11.15.3: धर्मयुद्ध में आपके पराक्रमी पुत्र को मारने का साहस कोई नहीं कर सकता था; इसलिए मैंने विषमतापूर्वक व्यवहार किया॥3॥   |   mahabharat अध्याय 11.15: भीमसेनका गान्धारीको अपनी सफाई देते हुए उनसे क्षमा माँगना, युधिष्ठिरका अपना अपराध स्वीकार करना, गान्धारीके दृष्टिपातसे युधिष्ठिरके पैरोंके नखोंका काला पड़ जाना, अर्जुनका भयभीत होकर श्रीकृष्णके पीछे छिप जाना, पाण्डवोंका अपनी मातासे मिलना, द्रौपदीका विलाप, कुन्तीका आश्वासन तथा गान्धारीका उन दोनोंको धीरज बँधाना   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 15: भीमसेनका गान्धारीको अपनी सफाई देते हुए उनसे क्षमा माँगना, युधिष्ठिरका अपना अपराध स्वीकार करना, गान्धारीके दृष्टिपातसे युधिष्ठिरके पैरोंके नखोंका काला पड़ जाना, अर्जुनका भयभीत होकर श्रीकृष्णके पीछे छिप जाना, पाण्डवोंका अपनी मातासे मिलना, द्रौपदीका विलाप, कुन्तीका आश्वासन तथा गान्धारीका उन दोनोंको धीरज बँधाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  11.15.3 
न हि युद्धेन पुत्रस्ते धर्म्येण स महाबल:।
शक्य: केनचिदुद्यन्तुमतो विषममाचरम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
धर्मयुद्ध में आपके पराक्रमी पुत्र को मारने का साहस कोई नहीं कर सकता था; इसलिए मैंने विषमतापूर्वक व्यवहार किया॥3॥
 
'No one could dare to kill your mighty son in a righteous war; therefore I behaved unequally.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)