तत: स भीमं च धनंजयं च
माद्रॺाश्च पुत्रौ पुरुषप्रवीरौ।
पस्पर्श गात्रै: प्ररुदन् सुगात्रा-
नाश्वास्य कल्याणमुवाच चैतान्॥ १७॥
अनुवाद
तत्पश्चात् रोते हुए धृतराष्ट्र ने सुन्दर शरीर वाले भीमसेन, अर्जुन और माद्री के दोनों पुत्र वीर नकुल-सहदेव को हृदय से लगाकर उन्हें सान्त्वना दी और कहा - 'आपका कल्याण हो' ॥17॥
Thereafter, crying Dhritrashtra hugged the beautiful bodied Bhimsen, Arjun and the two sons of Madri, the brave Nakul-Sahadeva and consoled them and said - 'May you be well'. 17॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रकोपविमोचने पाण्डवपरिष्वङ्गो नाम त्रयोदशोऽध्याय:॥ १३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें ‘धृतराष्ट्रका क्रोध छोड़कर पाण्डवोंको हृदयसे लगाना’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)