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mahabharat 11.1.31: वह सदैव युद्ध की इच्छा रखता था; इसलिए उसने कभी भी कोई धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धापूर्वक नहीं किया। वह मंदबुद्धि और अहंकारी था; इसलिए वह सदैव युद्ध-युद्ध चिल्लाता रहता था। उसका हृदय क्रूरता से भरा था। वह सदैव क्रोध से भरा रहता था, वीर और असंतुष्ट था (इसीलिए उसका इतना बुरा हश्र हुआ)।   |   mahabharat अध्याय 11.1: धृतराष्ट्रका विलाप और संजयका उनको सान्त्वना देना   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 1: धृतराष्ट्रका विलाप और संजयका उनको सान्त्वना देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  11.1.31 
न धर्म: सत्कृत: कश्चिन्नित्यं युद्धमभीप्सता।
अल्पबुद्धिरहंकारी नित्यं युद्धमिति ब्रुवन्।
क्रूरो दुर्मर्षणो नित्यमसंतुष्टश्च वीर्यवान्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
वह सदैव युद्ध की इच्छा रखता था; इसलिए उसने कभी भी कोई धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धापूर्वक नहीं किया। वह मंदबुद्धि और अहंकारी था; इसलिए वह सदैव युद्ध-युद्ध चिल्लाता रहता था। उसका हृदय क्रूरता से भरा था। वह सदैव क्रोध से भरा रहता था, वीर और असंतुष्ट था (इसीलिए उसका इतना बुरा हश्र हुआ)।
 
‘He always desired war; therefore he never performed any religious observance with respect. He was dull-witted and arrogant; therefore he always shouted war-war. His heart was full of cruelty. He was always full of resentment, was valorous and discontented (that is why he met with such a bad fate).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)