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श्लोक 10.8.94-95h  |
स शब्द: पूरितो राजन् भूतसंघैर्मुदायुतै:॥ ९४॥
अपूरयद् दिश: सर्वा दिवं चातिमहान् स्वन:। |
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| अनुवाद |
| राजन! प्रसन्नचित्त भूतों का वह महान् शब्द समस्त दिशाओं में तथा आकाश में गूंज उठा। 94 1/2॥ |
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| Rajan! That great noise made by the joyous ghosts echoed in all directions and in the sky. 94 1/2॥ |
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