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श्लोक 10.8.116-117h  |
पृष्ठच्छिन्नान् पार्श्वच्छिन्नान् शिरश्छिन्नांस्तथा परान्॥ ११६॥
स महात्माकरोद् द्रौणि: कांश्चिच्चापि पराङ्मुखान्। |
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| अनुवाद |
| महामनस्वी द्रोणपुत्र ने कितनों की पीठ काट डाली, कितनों की पसलियाँ तोड़ दीं, कितनों के सिर काट डाले और कितनों को भगा दिया ॥116 1/2॥ |
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| The great-minded son of Drona cut off the backs of some, broke the ribs of some, beheaded some and chased away many. ॥ 116 1/2॥ |
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