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mahabharat 10.8.109-110h: महाराज! कृपाचार्य और दुष्टबुद्धि कृतवर्मा दोनों ही द्रोणपुत्र अश्वत्थामा को यथासम्भव प्रसन्न करना चाहते थे; इसलिए उन्होंने शिविर में तीन ओर से आग लगा दी।   |   mahabharat अध्याय 10.8: अश्वत्थामाके द्वारा रात्रिमें सोये हुए पांचाल आदि समस्त वीरोंका संहार तथा फाटकसे निकलकर भागते हुए योद्धाओंका कृतवर्मा और कृपाचार्य द्वारा वध   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 8: अश्वत्थामाके द्वारा रात्रिमें सोये हुए पांचाल आदि समस्त वीरोंका संहार तथा फाटकसे निकलकर भागते हुए योद्धाओंका कृतवर्मा और कृपाचार्य द्वारा वध  »  श्लोक 109-110h
 
 
श्लोक  10.8.109-110h 
कृपश्चैव महाराज हार्दिक्यश्चैव दुर्मति:।
भूयश्चैव चिकीर्षन्तौ द्रोणपुत्रस्य तौ प्रियम्॥ १०९॥
त्रिषु देशेषु ददतु: शिबिरस्य हुताशनम्।
 
 
अनुवाद
महाराज! कृपाचार्य और दुष्टबुद्धि कृतवर्मा दोनों ही द्रोणपुत्र अश्वत्थामा को यथासम्भव प्रसन्न करना चाहते थे; इसलिए उन्होंने शिविर में तीन ओर से आग लगा दी।
 
Maharaj! Both Krupacharya and the evil-minded Kritavarma wanted to please Drona's son Ashwatthama as much as possible; therefore, they set fire to the camp from three sides.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)