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mahabharat 10.8.102-103h: प्रभु! वे भागते हुए सैनिक एक-दूसरे को पहचान नहीं पा रहे थे। भगवान के कारण वे अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। वे अपने सगे-संबंधियों को 'हे पिता! हे पुत्र!' कहकर पुकार रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 10.8: अश्वत्थामाके द्वारा रात्रिमें सोये हुए पांचाल आदि समस्त वीरोंका संहार तथा फाटकसे निकलकर भागते हुए योद्धाओंका कृतवर्मा और कृपाचार्य द्वारा वध   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 8: अश्वत्थामाके द्वारा रात्रिमें सोये हुए पांचाल आदि समस्त वीरोंका संहार तथा फाटकसे निकलकर भागते हुए योद्धाओंका कृतवर्मा और कृपाचार्य द्वारा वध  »  श्लोक 102-103h
 
 
श्लोक  10.8.102-103h 
विप्रणष्टाश्च तेऽन्योन्यं नाजानन्त तथा विभो॥ १०२॥
क्रोशन्तस्तात पुत्रेति दैवोपहतचेतस:।
 
 
अनुवाद
प्रभु! वे भागते हुए सैनिक एक-दूसरे को पहचान नहीं पा रहे थे। भगवान के कारण वे अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। वे अपने सगे-संबंधियों को 'हे पिता! हे पुत्र!' कहकर पुकार रहे थे।
 
Prabhu! Those fleeing soldiers were not able to recognize each other. Due to God they had lost their senses. They were calling out to their relatives saying 'Oh father! Oh son!' 102 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)