श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना  »  श्लोक 62-63
 
 
श्लोक  10.7.62-63 
सत्यशौचार्जवत्यागैस्तपसा नियमेन च।
क्षान्त्या भक्त्या च धृत्या च बुद्धॺा च वचसा तथा॥ ६२॥
यथावदहमाराद्ध: कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।
तस्मादिष्टतम: कृष्णादन्यो मम न विद्यते॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
बिना किसी प्रयास के महान् कर्म करने वाले श्रीकृष्ण ने सत्य, शौच, सरलता, त्याग, तप, नियम, क्षमा, भक्ति, धैर्य, बुद्धि और वाणी के द्वारा मेरी यथोचित पूजा की है; इसलिए श्रीकृष्ण से बढ़कर मुझे कोई प्रिय नहीं है॥62-63॥
 
Shri Krishna, who does great deeds without any effort, has worshiped me appropriately through truth, cleanliness, simplicity, renunciation, penance, rules, forgiveness, devotion, patience, intelligence and speech; Therefore, there is no one more dear to me than Shri Krishna. 62-63॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)