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mahabharat 10.7.60: ऐसा कहकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा प्रज्वलित अग्नि से प्रकाशित वेदी पर चढ़ गया और प्राणों की आसक्ति त्यागकर अग्नि के मध्य में बैठ गया।   |   mahabharat अध्याय 10.7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  10.7.60 
इत्युक्त्वा द्रौणिरास्थाय तां वेदीं दीप्तपावकाम्।
संत्यज्यात्मानमारुह्य कृष्णवर्त्मन्युपाविशत्॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा प्रज्वलित अग्नि से प्रकाशित वेदी पर चढ़ गया और प्राणों की आसक्ति त्यागकर अग्नि के मध्य में बैठ गया।
 
Saying this, Drona's son Ashvatthama climbed up the altar illuminated by the blazing fire and, giving up his attachment to life, sat in the middle of the fire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)