श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  10.7.57 
भवद्भक्त्या महादेव परमेण समाधिना।
अस्यामापदि विश्वात्मन्नुपाकुर्मि तवाग्रत:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
विश्वात्मान! महादेव! इस संकट की घड़ी में मैं पूर्ण श्रद्धा से अपना मन आपकी ओर एकाग्र करके आपको यह अर्पण कर रहा हूँ (कृपया इसे स्वीकार करें)।
 
Vishwatman! Mahadev! In this time of crisis, I am concentrating my mind towards you with full devotion and offering this to you (please accept it).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)