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mahabharat 10.7.56: अश्वत्थामा बोला - प्रभु! आज मैं अपने शरीर को अंगिरस कुल में जन्म लेने के कारण प्रज्वलित अग्नि में आहुति देता हूँ। कृपया मुझे हविष्य के रूप में स्वीकार करें।   |   mahabharat अध्याय 10.7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  10.7.56 
द्रौणिरुवाच
इममात्मानमद्याहं जातमाङ्गिरसे कुले।
स्वग्नौ जुहोमि भगवन् प्रतिगृह्णीष्व मां बलिम्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
अश्वत्थामा बोला - प्रभु! आज मैं अपने शरीर को अंगिरस कुल में जन्म लेने के कारण प्रज्वलित अग्नि में आहुति देता हूँ। कृपया मुझे हविष्य के रूप में स्वीकार करें।
 
Ashwatthama said – Lord! Today I offer my body as an offering to the burning fire of my birth in the Angiras clan. Please accept me in the form of future.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)