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mahabharat 10.7.43: भगवान शंकर भी प्रतिदिन उसके कर्मों को देखकर आश्चर्यचकित होते थे। वह मन, वाणी और कर्म से सावधान होकर सदैव महादेवजी का पूजन करता था॥43॥   |   mahabharat अध्याय 10.7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  10.7.43 
येषां विस्मयते नित्यं भगवान् कर्मभिर्हर:।
मनोवाक्कर्मभिर्युक्तैर्नित्यमाराधितश्च यै:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
भगवान शंकर भी प्रतिदिन उसके कर्मों को देखकर आश्चर्यचकित होते थे। वह मन, वाणी और कर्म से सावधान होकर सदैव महादेवजी का पूजन करता था॥43॥
 
Even Lord Shankar was surprised to see his deeds every day. He always worshiped Mahadevji by being cautious through his mind, speech and actions. 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)